पृष्ठ

विज्ञान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
विज्ञान लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 4 जुलाई 2011

इन्द्रियजनित चेतना और विज्ञान

Add to Google
                                               इन्द्रियजनित चेतना और विज्ञान
संसार की वस्तुओं को जड़ और चेतन में विभाजित किया जा सकता है। सभी जीव (प्राणी) चेतनशील हैं। यह चेतना ही है जिसके कारण प्राणी बाहरी उत्तेजनाओं के प्रति प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। मनुष्य भी प्राणी है, इसलिए चेतनशील है, परन्तु उसकी चेतना अन्यान्य प्राणियों के मुकाबले उत्कृष्ट है, इसलिए वह ज्ञान-विज्ञान से परिपूर्ण है। तात्पर्य यह है कि ‘ज्ञान-विज्ञान’ का निकटतम सम्बन्ध हमारी ‘चेतना’ से है, क्योंकि चेतना के बिना ज्ञान-विज्ञान का कोई आस्तित्व ही सम्भव नहीं। इसलिए, विज्ञान के वास्तविक स्वरूप को समझना है तो मनुष्य की चैतन्य-शक्ति का स्वरूप समझना आवश्यक है। यही कारण है कि भारतीय दर्शन सर्वप्रथम मनुष्य में अन्तर्निहित चैतन्य-शक्ति का अध्ययन करता है और उसकी जानकारी देता है जो योगदर्शनों से स्पष्ट होता है। विज्ञान का अध्ययन अत्यल्प भी है और अपूर्ण भी। फिर भी, आधुनिक विज्ञानविद् स्वीकार करते हैं कि चेतना और इसकी प्रक्रिया में ही बुद्धि और ज्ञान की स्थिति निहित है।
मानवी चेतना को हम आधुनिक विज्ञान के माध्यम से भी समझ सकते हैं। विदित हो कि वाह्य-उत्तेजनाओं का ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रकृति ने हमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ प्रदान की हैं। चक्षु (आँख) से दृश्य-उत्तेजना, श्रोत (कान) से श्रवण (ध्वनि) उत्तेजना, नासिका से गन्ध-उत्तेजना, जिह्वा से स्वाद-उत्तेजना और त्वचा से स्पर्श-उत्तेजना की चेतना प्राप्त होती है। तात्पर्य यह है कि इन्हीं ज्ञानेन्द्रियों से हम वाह्य उत्तेजना की चेतना (ज्ञान) प्राप्त करते हैं।
ज्ञानेन्द्रियों के रूप में जो स्थूल अंग हैं, वे तो महज ग्राहक-यन्त्र हैं। उनसे जुड़ी हुई है स्नायु-प्रणाली और यह प्रणाली मस्तिष्क से जुड़ा हुआ है। आधुनिक विज्ञान में स्नायु-प्रणाली और मस्तिष्क का सूक्ष्मातिसूक्ष्म विवेचन किया गया है। इससे इन्द्रियजनित अनुभूतियों (चेतनाओं) की कुछ हद तक व्याख्या तो हो ही जाती है। परन्तु, यहाँ एक प्राकृतिक तथ्य को विस्मृत कर बैठते हैं जिसके कारण इससे सम्बन्धित ‘विज्ञान’ अधूरा रह जाता है।
यहाँ पर हम ‘मन’ की सत्ता को विस्मृत कर बैठते हैं, क्योंकि वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा मन की सत्ता का प्रमाण नहीं मिल पाया है। फिर भी, ध्यान एक ऐसी मनोस्थिति है जिसकी अनुभूति हर व्यक्ति को होती है। आधुनिक मनोविज्ञान स्वीकार करता है कि यह (ध्यान) मन की बलात्मक शक्ति है। किसी ज्ञानेन्द्रिय (मान लें कि आँख) के सम्मुख कोई वाह्य-उत्तेजना स्थित हो, परन्तु हमारा ध्यान वहाँ नहीं जाता तो उस उत्तेजना की संवेदना नहीं होती। इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि हमारी इन्द्रियों पर ‘मन’ का नियंत्रण है और वह अपनी ध्यान संज्ञक शक्ति को निरोपित कर उनसे कार्य कराता है। इस सम्बन्ध में विस्तृत चर्चा हम यथास्थान अवश्य करेंगे। यहाँ यह आभास देना भर था कि चेतना के मनरूपी इस प्रधान कारण को विज्ञान समझ नहीं पाया है, ऐसी स्थिति में सामान्य मनुष्य कैसे समझ पायेगाॽ  
यही कारण है कि हम उस ज्ञान को ही प्रमाणिक मान बैठते हैं जो इन्द्रियों के माध्यम से प्रत्यक्ष होता है। उदाहरण के लिए धरती और सूर्य की इन्द्रियजनित अनुभूति पर विचार करें। इन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान के आधार पर हमें आभासित होता है कि हमारी धरती चौरस और सपाट है जबकि यह वास्तविक सत्य नहीं है। विज्ञान द्वारा प्रमाणित सत्य यह है कि हमारी पृथ्वी का आकार नारंगी की तरह गोलाकार है।
इसीप्रकार, इन्द्रियजनित अनुभूतियाँ बताती हैं कि हमारी पृथ्वी स्थिर है और सूर्य इसके चारों ओर चक्कर लगा रहा है जिसके कारण दिन-रात घटित हो रहा है। यह स्थिति सभी मनुष्यों के साथ है, चाहे वह वैज्ञानिक ज्ञान से परिपूर्ण हो या न हो। परन्तु, स्थिति इसके ठीक उलट है। विज्ञान बताता है कि हमारी गोलाकार पृथ्वी अपनी धूरी पर लट्टू की तरह अपने ही चारों ओर घूमती रहती है। उसके इस चक्कर की एक आवृत्ति चौबीस घंटे में पूर्ण होती है। पृष्वी की अपेक्षा सूर्य अपने स्थान पर स्थिर है जिसके कारण सूर्य का प्रकाश धरती पर पड़ता है। धरती का जो हिस्सा सूर्य के सामने पड़ता है, वहाँ दिन होता है और जो हिस्सा पीछे रह जाता है, वहाँ रात होती है। चूँकि, पृथ्वी अपनी धूरी पर लट्टू की भाँति लगातार घूम रही है, इसलिए जो हिस्सा सूर्य के सामने था, वह हिस्सा खिसकता हुआ पीछे चला जाता है और पीछे का हिस्सा आगे आता जाता है।
 इससे यह निश्चित हो जाता है कि इन्द्रियजनित ज्ञान में वैज्ञानिकता का अभाव सम्भव है। प्रश्न यह है कि वैज्ञानिक सत्य को जानने के लिए इन्द्रियातीत अनुभूति (ज्ञान) की आवश्यकता हैॽ पाश्चात्यवादी विद्वानों के पास इन्द्रियातीत अनुभूतियों की कोई परिकल्पना नहीं थी। उन्होंने इन्द्रियजनित ज्ञान से ऊपर की जानकारी के लिए उपकरणों की रचना की जिन्हें वैज्ञानिक उपकरण की संज्ञा दी गई। इसप्रकार वैज्ञानिक उपकरण निर्मित हुए जो वैज्ञानिक ज्ञान के विकास के माध्यम बने। इस क्रम में ज्यों-ज्यों जानकारियाँ बढ़ती गईं, त्यों-त्यों तकनिकी विकास के क्रम में नये-नये उपकरण बनते गये। इसप्रकार, पाश्चात्यवादी वैज्ञानिक जानकारी मूलतः उपकरणों के तकनिकी विकास पर आश्रित रहा है। विज्ञान की इस  पाश्चात्य पद्धति ने कल-युग की स्थापना की है।   
Ramashankar Jamayyar
E-44, Koshi Colony,
Birpur, Distt. Supaul (Bihar)hostgator coupons

शनिवार, 2 जुलाई 2011

वैदिक विज्ञान ऊर्जा का विज्ञान


हमने देखा की इन्द्रियजनित चेतना में ‘भ्रमिक ज्ञान’ की स्थिति भी उत्पन्न होती है। भ्रमिक ज्ञान का परिमार्जन करना ही विज्ञान है। इस हेतु यूरोपियन विद्वानों ने १५वीं सदी से ही कार्य करना आरम्भ कर दिया था। कहा जाता है चीन में बारुद का अविष्कार हुआ, फिर छापाखाने का भी अविष्कार हुआ। यूरोपियन विद्वानों ने विज्ञान को इससे आगे बढ़ाया और ऐसे उपकरण बनाये जिससे इन्द्रियजनित चेतना से ऊपर उठकर प्रमाणिक जानकारियाँ प्राप्त की गईं। यह ज्ञात हुआ कि पृथ्वी सपाट और चौरस नहीं, बल्कि गोलाकार है। पृथ्वी की अपेक्षा सूर्य के स्थिर रहने एवं पृथ्वी की दैनिक गति के कारण दिन-रात घटित होते हैं। ये वैज्ञानिक उपकरण न केवल कृत्रिम (मनुष्य के बनाये हुए) थे, बल्कि पदार्थ से बने अर्थात् भौतिक भी थे। इसलिए, विज्ञान की दिशा भौतिकवादी रही। विज्ञान का यह नया स्वरूप था जिसे हम पाश्चात्यवादी-विज्ञान कह सकते हैं क्योंकि इसने पदार्थ के सन्दर्भ में ही संसार को देखने की पद्धति को स्वीकार किया है। निश्चितरूप से इसका कारण यह भी है कि विज्ञान के सभी उपकरण कृत्रिम और भौतिक हैं। १९वीं सदी तक आलम यह था कि भौतिक सातत्य को ही सृष्टि का आधार माना जाता था। ऊर्जा को पदार्थ से परे मानते हुए भी यह बताया गया कि ऊर्जा की स्थिति भौतिक सातत्य में ही है। किसी जार में कॉल-वेल (विद्युतचालित घंटी) रखकर वायु-चूषक यन्त्र से उस जार की हवा को खाली करने पर जब घंटी बजायी गई तो पाया गया कि ध्वनि नहीं आ रही है। स्पष्ट था कि ध्वनि तरंगे भौतिक माध्यम में ही बनती हैं। हम यह भी पाते हैं कि विद्युत धारा भी तांबे आदि के तारों के माध्यम से ही बहती है। टेलिफोन के अविष्कार से भी यह स्पष्ट हुआ कि ध्वनि का संचार भी तारों के माध्यम से ही हो रहा है। इन सबका अर्थ यह भी निकला कि ऊर्जा का आधारभूत माध्यम पदार्थ ही है।
विज्ञान का पुरातन स्वरूप परम्परागतरूप से भारत में प्रचलित है जिसमें ‘पदार्थ‘ के स्थान पर ‘ऊर्जा‘ को प्राथमिकता दी गई है। इसके अन्तर्गत पदार्थ का अध्ययन भी उर्जा के सन्दर्भ में ही किया जाता है और संसार का भी। भारतीय विज्ञान को ‘वैदिक विज्ञान‘ की संज्ञा दी जा सकती है।  
यह बात सही है कि मनुष्यादि प्राणियों का शरीर भौतिक है अर्थात् पदार्थ से बना है, इसलिए पदार्थ की रचना को ही भौतिक संसार का आरम्भ माना जा सकता है। पदार्थ की ईकाई है परमाणु जो इलेक्ट्रॉन, प्रोटोन और न्यूट्रॉन नामक कणों से बना है। इलेक्ट्रन कणों पर विद्युत का ऋण-आवेश होता है और प्रोटॉन कणों पर धन-आवेश। न्यूट्रॉन कण उदासीन होते हैं जिसका भ्रामकरूप से अर्थ निकाला जाता है कि उसपर विद्युत का कोई आवेश नहीं होता। इस विशेष ज्ञान का प्रमाण चुम्बक के अध्ययन से मिलता है। चुम्बक का एक सिरा उत्तरी ध्रुव कहा जाता है तो दूसरा सिरा दक्षिणी ध्रुव। इन ध्रुवों पर चुम्बक की शक्ति अधिकतम होती है जबकि चुम्बक के केन्द्र पर चुम्बकीय शक्ति उदासीन स्वरूप में होती है।  इस सन्दर्भ में न्यूट्रॉन के सम्बन्ध में कहा जा सकता है कि उसपर विदुयुत-शक्ति का केन्द्रीय आवेश होता है, इसलिए वह उदासीन है। परमाणु के ये अवयवी कण निश्चय ही पदार्थ से परे हैं, इसलिए ये ऊर्जा के ही स्वरूप हैं। अतः प्राकृतिक वास्तविकता यह है कि परमाणु की रचना ऊर्जा से ही हुई है अर्थात् भौतिकता का सृजन ऊर्जा से हुआ है। (परमाणु की उत्पत्ति, संरचना आदि के सम्बन्ध में विस्तृत चर्चा यथास्थान करेंगे तथा शेष व्याख्याएँ वहाँ अंकित करेंगे।)
 वैदिक विज्ञान में जब सृष्टि का उल्लेख किया जाता है तो ‘ईश्वर‘ (ब्रह्म) की धारणा प्रस्तुत की जाती है। यह ब्रह्म ॐकार वाच्य स्वरूप है अर्थात् इसका सम्बन्ध ध्वनि (ऊर्जा) से है। वह (ॐकार वाच्य) ध्वनि ऊर्जा का परम-स्वरूप है, क्योंकि ब्रह्म भी परम है। ऊर्जा का यह परम-स्वरूप ही परमाणु की रचना करने वाली शक्ति है जो अपने तीन सापेक्ष स्वरूपों में प्रकट होती है जिन्हें ग्रन्थों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश (त्रिदेवा) की संज्ञा दी गई है---
ब्रह्मविष्णुशिवा ब्रह्मन्प्रधाना ब्रह्म शक्तयः (विष्णु पुराण, १/२२/५८)।
स्पष्ट है कि वैदिक विज्ञान की धारा ऊर्जा से पदार्थ की दिशा में है और यही वास्तविक स्थिति है। आइन्स्टीन के सापेक्षता सिद्धान्त के आधार पर किये गये प्रयोगों से यह प्रमाणित हुआ है कि प्राकृतिक शक्तियाँ (ऊर्जा) देशकालिक-सातत्य (ब्रह्म-सातत्य) के अन्तर्गत भिन्न-भिन्न प्रकार के विकुंचन हैं। और, इस क्रम में यह भी प्रमाणित हुआ है कि ऊर्जा (विकुंचन) और पदार्थ (परमाणु) एक ही सत्ता के दो अलग-अलग रूप हैं—एक ही सिक्के के दो पहलु हैं।
कथितार्थ यह है कि आधुनिक विज्ञान और वैदिक विज्ञान की दिशा एक दूसरे के विपरीत है। भौतिकवादी होने के कारण आधुनिक विज्ञान की दिशा ऋणात्मक (अकल्याणकारी या आसुरी) है, इसलिए उसका ज्ञान-क्षेत्र सीमित है जबकि वैदिक विज्ञान की दिशा अध्यात्मवादी अर्थात् प्राकृतिक वास्विकताओं के अनुरूप है-धनात्मक है, इसलिए इसका ज्ञान-क्षेत्र असीमित है—व्यापक है।
Ramashankar Jamayyar
E-44, Koshi Colony,

गुरुवार, 27 मई 2010

अंकगणित का इतिहास और विज्ञान

            मानव-बुद्धि अत्यन्त जिज्ञासु होती है। किसी भी चीज को गिनती या माप-तौल कर ठीक-ठीक जानने का प्रयास किया जाता है। गणना की यह विद्या गणित के नाम से जानी जाती है।  गणित को पढ़ने-समझने एवं काम में लाने के लिए जिस व्याकरण की रचना की गई है, उसे ‘अंकगणित’ कहा जाता है। अंकगणित संज्ञक यह व्याकरण अंकों के विभन्न प्रयोगों के नियम को निर्धारित करता है।
      यद्यपि अंकगणित का इतिहास भारत से आरम्भ होता है, फिर भी हम रोमन-अंकगणित से इसकी चर्चा आरम्भ करेंगे। यह यूरोप की प्राचीनतम सभ्यता ‘रोमन-सभ्यता’ की देन है।
      गिनती सीखने की प्रारम्भिक प्रक्रिया में हम प्रायः अपनी हथेलियों और उँगलियों का प्रयोग करते हैं। तर्जनी को खड़ी कर ‘एक’ की संख्या बताते हैं। दो उँगलियों से दो की, तीन उँगलियों से तीन की और चार उँगलियों से चार की संख्या बताई जाती है। एक हथेली में कुल पाँच उँगलियाँ होती हैं, इसलिए एक हथेली खोलकर पाँच का संकेत दिया जाता है। दोनों हथेलियों को खोलने से पाँच+पाँच=दस की संख्या का संकेत दिया जाता है।
      जिस प्रकार भाषा के लिए अक्षरों की आवश्यकता होती है, गणित के लिए अंको की आवश्यकता होती है। रोमनों ने अंको को गढ़ने के लिए रोमन अक्षरों का प्रयोग किया। तर्जनी को खड़ी करने से एक का संकेत मिलता है और यह आकार में आई (I) अक्षर-सी दीखती है, इसलिए I (आई) को एक की संख्या का प्रतीक मान लिया गया। एक हथेली को पूरी तरह खोलने से पाँच का संकेत मिलता है और हथेली का आकार ‘भी’ (V) जैसा होता है, इसलिए V को पाँच का प्रतीक मान लिया गया। दोनों हथेलियों को परस्पर क्रॉस करने से दसों उँगलिया दीखती हैं, इसलिए X को दस का प्रतीक मान लिया गया। इस भाँति रोमन-अंकगणित में तीन अंक हुए—I (एक), V (पाँच) और X (दस)। विदित हो कि ये संख्याएँ इकाई अक्षरों से प्रकट की जाती हैं, इसलिए इन्हें ‘अंक’ माना गया। यह नियम बनाया गया कि मूल अंक के दाहिने स्थित अंक उसके मान में अपने मान को जोड़ देगा। इस आधार पर दो अगली संख्याएँ लिखी जा सकीं—II (एक+एक=दो), III (दो+एक=तीन), VI (पाँच+एक=छह), VII (पाँच+दो=सात) एवं VIII (पाँच+तीन=आठ)। अगला नियम यह बनाया गया कि मूल अंक के वाम भाग में स्थित होने वाला अंक मूल अंक के मान में अपने मान के बराबर कमी कर देगा—IV (पाँच-एक=चार), IX (दस-एक=नौ)। इस प्रकार, इन तीन अंकों से एक से दस तक की संख्याओं को लिपिबद्ध किया गया। यही रोमन अंकगणित की प्रारम्भिक अवस्था थी। मध्य युग में पचास के लिए L एवं सौ के लिए C का प्रयोग किया गया।
            इस अंकगणित में मूलतः पाँच अंक (इकाई स्थान को घेरने वाले) हैं। इनमें अधिकतम मान वाला अंक X  है। रोमनों की काल-गणना की वार्षक पद्धति भी आरम्भ में दस की संख्या पर ही आधारित थी। सप्तम् शब्द से जिस माह का नाम पड़ा, वह सितम्बर है। इसीप्रकार, अष्टम् से अक्तूबर, नवम् से नवम्बर एवं दशम् से दिसम्बर माह का नाम पड़ा। इससे स्पष्ट होता है कि आरम्भ में रोमन-कैलेन्डर में कुल दस माह ही थे जिसकारण वर्ष के अन्तिम माह का नाम दिसम्बर पड़ा। ईसा मसीह के नाम पर स्थापित संवत की स्थापना होने पर इसमें जनवरी और फरवरी माह को आरम्भ में जोड़ा गया जिस कारण दिसम्बर वर्ष का अन्तिम अर्थात् बारहवाँ महीना बन गया। इन माहों के नाम से यह भी आभासित होता है कि रोमन-सभ्यता में गिनती के नाम भी भारत से ही लिये गये थे। परन्तु वे भारत के ‘शून्य’ का ज्ञान स्वीकार नहीं कर पाये। भारतीय अंकगणित में जिस शून्य का उपयोग किया गया है उसका वास्तविक ज्ञान भारत के आध्यात्मिक ज्ञान के बिना सम्भव नहीं है। रोमन सभ्यता पूरी तरह से भौतिकवादी थी। इस सम्बन्ध में पुराणों में स्पष्ट किया गया है कि एकमात्र भारत ही ऐसी भूमि (देश) है जिसकी संस्कृति अध्यात्मवादी है जबकि शेष भूमियों (देशों) की संस्कृति भोगवादी (भौतिकवादी) है—अत्रापि भारतं श्रेष्ठं जम्बूद्वीपे महामुने। यतो हि कर्मभूरेषा ह्यतोऽन्या भोगभूमयः।।(वि०पु०,2/3/22)।। शून्य की व्याख्या आध्यात्मिक ज्ञान के बिना सम्भव। नहीं है, इसलिए भोगवादी होने के कारण शून्य की स्थिति न तो समझ पाये और न ग्रहण कर पाये। फलतः उन्होंने अंकों के निर्धारण के लिए रोमन वर्णमाला का उपयोग किया। वैज्ञानिक दृष्टि से रोमन-अंकगणित असफल था, क्योंकि इसमें गुणन एवं विभाजन की कोई व्यवस्था नहीं थी।
      डार्विन अपने विकासवादी सिद्धान्त के अन्तर्गत बताते हैं कि ‘मनुष्य-जाति एवं उसकी बुद्धि (मस्तिष्क) का क्रमिक विकास हुआ। मनुष्य की उत्पत्ति वनमानुष की अगली पीढ़ी के रूप में हुआ और वह आरम्भ में पशुमानव था। फिर उसका विकास बुद्धिमान-मानव के रूप में हुआ। इस अवस्था में उसने सभ्यताओं की स्थापना की। उसका अगला विकास वैज्ञानिक-बुद्धि सम्पन्न मानव के रूप में हुआ। आधुनिक विज्ञान का आरम्भ यूरोप में हुआ, इसये डार्विन के अनुसार वैज्ञानिकबुद्धि सम्पन्न मानवों का विकसित स्वरूप सर्वप्रथम यूरोप में ही प्रकट हुआ।
            यह समझाने की कोई आवश्यकता नहीं कि गणित ही विज्ञान की आधारभूत विद्या है। जो सिद्धान्त गणित के प्रतिकूल जाते हों, उन्हें वैज्ञानिक सिद्धान्त नहीं माना जाता है, क्योंकि गणित में ही सत्य के प्रतिपादन की क्षमता है। आधुनिक विज्ञान में ‘रोमन-अंकगणित’ का कोई स्थान नहीं है। वह जिस गणित को स्वीकार करता है, वह शून्य-आधारित गणित है। इसकी जिस लिपि को सर्वमान्य समझा गया है, उस हम भूलवश अंग्रेजी-लिपि मान लेते हैं। परन्तु, यह हमारी भूल है, क्योंकि यह अंकों की अरबी-लिपि है।
      इतिहास प्रमाणित करता है कि अरबों-मंगोलों के औपनिवेशिक शासन-काल में ही यूरोपवासियों शून्य-आधारित अंकगणित का ज्ञान मिला, जिसके लिए उन्होंने अंकों की अरबी लिपि को यथावत् स्वीकार किया। इस अंकगणित के साथ-साथ यूरोपवासियों को उनसे ‘बारूद’ का भी ज्ञान मिला। इन दोनों ज्ञान को स्वीकार करने के फलस्वरूप ही यूरोपवासियों में वैज्ञानिक जागृति सम्भव हो सका। तात्पर्य यह है कि शून्य आधारित अंकगणित का प्रकाश उन्हें एशिया से मिला, इसलिए विज्ञान की आधारभूत विद्या एशिया में मौजूद थी।
      इतिहास यह भी प्रमाणित करता है कि अरबों ने शून्य-आधारित अंकगणित का ज्ञान ‘भारत’ से प्राप्त किया और मंगोलों ने यह ज्ञान अरबों से प्राप्त किया। अरबों ने अंकों की भारतीय लिपि का रूपान्तरण किया जिसे अंकों की अरबी-लिपि कहा जाता है। अतः शून्यआधारित अंकगणित का आदि-प्रणेता भारत है और भारतवासी वैज्ञानिक-बुद्धि से सम्पन्न थे। इसका प्रमाण रामसेतु से मिलता है। वर्ष 2003-04 में एक अमेरिकी भू-उपग्रह ने पता लगाया था कि रामसेतु का शेष भाग समुद्रतल पर उपस्थित है एवं अपनी कम्प्यूट्रीकृत व्यवस्था के माध्यम से इसे लगभग दस लाख वर्ष पुराना बताया था। भगवान श्रीराम ने लंका पर आक्रमण के लिए समुद्र पर रातोंरात जिस पुल का निर्माण किया था, उसे ही रामसेतु कहा जाता है। सोचिए, एक नदी पर पुल बाँधने में कई माह/वर्ष लग जाते हैं जबकि श्रीराम ने रातोंरात समुद्र पर पुल बाँध लिया था! उस समय का भारतीय विज्ञान आज की अपेक्षा कितना उन्नत था!
रमाशंकर जमैयार